shivam singh Rajput

Friday, 12 April 2019

जिन्दगी हर रोज कुछ न कुछ नया कर रही है

कभी हर सपना पूरा तो कभी सब कुछ धुवा कर रही हैं       जिन्दगी हर रोज कुछ न कुछ नया कर रही है कभी तो समझ आती है जिन्दगी कि हर चाल कभी मालूम ही नहीं चलता के ये क्या कर रही है आस  कुछ होती है मिलता कुछ और है इस कलयुग में हम बोते कुछ और है निकलता कुछ और है समभावनाय जीने कि आस बढ़ाती है निराशाएं सब कुछ छोड़ जाने को कहती हैं मजबुर इन्सान सब कुछ करने को तैयार है ये ज़िन्दगी जो उससे करा रही है कभी हर सपना पूरा तो कभी सब कुछ धुवा कर रही है जिन्दगी हर रोज कुछ न कुछ नया कर रही है
टुटे हुए सपने  ही जिन्दगी से लडना सिखाते हैं
और कभी ये ही सपने जिन्दगी से डरना सिखाते हैं
हाथों पे हाथ रख बैठने से भी कुछ नहीं होता
और कभी कभी बहुत कुछ करने से भी कुछ नहीं होता
हर इंसान को उन्हीं रास्तों पर चलना पड़ता है जो रास्ता ये ज़िन्दगी दिखा रही है कभी हर सपना पूरा तो कभी सब कुछ धुवा कर रही है जिन्दगी हर रोज कुछ न कुछ नया कर रही है कुछ लोग ये कयु कहते हैं अच्छे के साथ बुरा होता है और कुछ लोग ये कयु कहते हैं कि बुरे के साथ बुरा होता है दोनों में से न जाने कोन सही है किसी को मालूम नहीं बस वही सच है दोस्तों जो ये ज़िन्दगी हमको यां तुमको दिख रही है कभी हर सपना पूरा तो कभी सब कुछ धुवा कर रही है जिन्दगी हर रोज कुछ न कुछ नया कर रही है।
                                                                                      (मेरी कलम से)

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