Saturday, 4 April 2020

शांतिदूतों की उद्दंडता और पुलिस की नरमी

विश्व स्तर पर चल रही कोरोना महामारी ने संपूर्ण धरातल को हिलाकर रख दिया है। इस महामारी से निपटने के लिए विभिन्न देश येन, केन, प्रकारेण हर जुगत करने को प्रतिबद्ध हैं। हमने अपने जीवनकाल में पहली बार ऐसा समय देखा है जब दुनिया ठहर सी गयी है, वक़्त रुक सा गया है। यदि घर से बाहर झांको तो लगता है कि मानो इंसान रह ही न गए हों हमारे आसपास। हर चीज का दायरा सीमित हो गया है। यहां तक कि खाने-पीने और उठने बैठने पर भी पाबंदी है।

भारत देश के छोड़कर कई देश ऐसे हैं, जहां कोरोना से संक्रमित व्यक्ति को सीधे गोली मार दी जाती है और उसकी लाश तक को छूने नहीं दिया जाता क्योंकि खतरा है कि कहीं किसी प्रदेश में यह संक्रमण न फैल जाए। इसका ताजा उदाहरण चीन देश है। जहां पर कई लोगों को, जो कि कोरोना की चपेट में आए, मार दिया गया। चीन के अलावा भी कई ऐसे देश हैं, जहां पर ऐसा हो रहा है।

ज्यादा नहीं तो कोरोना वायरस से संक्रमित व्यक्ति को उसके परिवार सहित अन्य लोगों से दूर कर दिया जा रहा है क्योंकि यदि ऐसा नहीं किया गया तो फिर यह धीरे धीरे अन्य जगहों पर भी फैल जाएगा। कई देशों में तो यह भी सुनने में आया है कि किसी धर्म विशेष को कोरोना वायरस फैलने का जिम्मेदार मानते हुए पूरे-पूरे समुदाय को मार दिया गया। दूसरे शब्दों में हम इसे नरसंहार कह सकते हैं। एक ऐसा नरसंहार जो शायद न चाहते हुए अन्य देशों को करना पड़ रहा है क्योंकि उनकी वजह से अन्य लोगों के जीवन को खतरे में नहीं डाला जा सकता।

समाचार एजेंसियों के मुताबिक चीन के वुहान से फैला यह संक्रमण इस समय पूरे विश्व में अपने पैर पसार चुका है। हालांकि इसमें सबसे बड़ा दोष मनुष्य का ही है, फिर वो किसी भी देश का हो लेकिन रहता तो आखिर पृथ्वी पर ही है। इससे पता चलता है कि किसी भी एक देश का गलत मैनेजमेंट कहीं न कहीं पूरे विश्व को छोटे या बड़े स्तर पर प्रभावित करता है।
हमारे भारतवर्ष के अलावा अन्य देशों के पास अच्छी से अच्छी मेडिकल सुविधाएं हैं। अच्छे असेंबल है। अच्छा मैनेजमेंट है लेकिन फिर भी अमेरिका, इटली और ब्रिटेन जैसे देशों ने इस महामारी के आगे अपने घुटने टेक दिए। हालांकि हर देश अपने नागरिकों को इससे बचाने का नाकाम प्रयास कर रहा है।
अब बात करते हैं अपने प्यारे भारतवर्ष की,

आज से करीब 73 वर्ष पहले की। तब भारतीय कांग्रेस पार्टी देश का प्रतिनिधित्व कर रही थी। 15 अगस्त 1947 की आधी रात को भारत और पाकिस्तान कानूनी तौर पर दो स्वतंत्र राष्ट्र बने।[2] लेकिन पाकिस्तान की सत्ता परिवर्तन की रस्में 14 अगस्त को कराची में की गईं ताकि आखिरी ब्रिटिश वाइसराॅय लुइस माउंटबैटन, करांची और नई दिल्ली दोनों जगह की रस्मों में हिस्सा ले सके। इसलिए पाकिस्तान में स्वतंत्रता दिवस 14 अगस्त और भारत में 15 अगस्त को मनाया जाता है।

भारत के विभाजन से करोड़ों लोग प्रभावित हुए। विभाजन के दौरान हुई हिंसा में करीब 10 लाख 3 लोग मारे गए और करीब 1.45 करोड़ शरणार्थियों ने अपना घर-बार छोड़कर बहुमत संप्रदाय वाले देश में शरण ली।

उधर, भारत के ब्रिटिश शासकों ने हमेशा ही भारत में "फूट डालो और राज्य करो" की नीति का अनुसरण किया। उन्होंने भारत के नागरिकों को संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग समूहों में बाँट कर रखा। उनकी कुछ नीतियाँ हिन्दुओं के प्रति भेदभाव करती थीं तो कुछ मुसलमानों के प्रति। 20वीं सदी आते-आते मुसलमान हिन्दुओं के बहुमत से डरने लगे और हिन्दुओं को लगने लगा कि ब्रिटिश सरकार और भारतीय नेता मुसलमानों को विशेषाधिकार देने और हिन्दुओं के प्रति भेदभाव करने में लगे हैं। इसलिए भारत में जब आज़ादी की भावना उभरने लगी तो आज़ादी की लड़ाई को नियंत्रित करने में दोनों संप्रदायों के नेताओं में होड़ रहने लगी।

इससे पहले सन् 1906 में ढाका में बहुत से मुसलमान नेताओं ने मिलकर मुस्लिम लीग की स्थापना की। इन नेताओं का विचार था कि मुसलमानों को बहुसंख्यक हिन्दुओं से कम अधिकार उपलब्ध थे तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस हिन्दुओं का प्रतिनिधित्व करती थी। मुस्लिम लीग ने अलग-अलग समय पर अलग-अलग मांगें रखीं। 1930 में मुस्लिम लीग के सम्मेलन में प्रसिद्ध उर्दू कवि मुहम्मद इक़बाल ने एक भाषण में पहली बार मुसलमानों के लिए एक अलग राज्य की माँग उठाई। 1935 में सिंध प्रांत की विधान सभा ने भी यही मांग उठाई। इक़बाल और मौलाना मुहम्मद अली जौहर ने मुहम्मद अली जिन्ना को इस मांग का समर्थन करने को कहा। इस समय तक जिन्ना हिन्दू-मुस्लिम एकता के पक्ष में लगते थे, लेकिन धीरे-धीरे उन्होने आरोप लगाना शुरू कर दिया कि कांग्रेसी नेता मुसलमानों के हितों पर ध्यान नहीं दे रहे। लाहौर में 1940 के मुस्लिम लीग सम्मेलन में जिन्ना ने साफ़ तौर पर कहा कि वह दो अलग-अलग राष्ट्र चाहते हैं

"हिन्दुओं और मुसलमानों के धर्म, विचारधाराएँ, रीति-रिवाज़ और साहित्य बिलकुल अलग-अलग हैं।.. एक राष्ट्र बहुमत में और दूसरा अल्पमत में, ऐसे दो राष्ट्रों को साथ बाँध कर रखने से असंतोष बढ़ कर रहेगा और अंत में ऐसे राज्य की बनावट का विनाश होकर रहेगा।

हिन्दू महासभा जैसे हिन्दू संगठन भारत के बंटवारे के प्रबल विरोधी थे, लेकिन मानते थे कि हिन्दुओं और मुसलमानों में मतभेद हैं। 1937 में इलाहाबाद में हिन्दू महासभा के सम्मेलन में एक भाषण में वीर सावरकर ने कहा था - आज के दिन भारत एक राष्ट्र नहीं है, यहाँ पर दो राष्ट्र हैं-हिन्दू और मुसलमान। कांग्रेस के अधिकतर नेता पंथ-निरपेक्ष थे और संप्रदाय के आधार पर भारत का विभाजन करने के विरुद्ध थे। महात्मा गांधी का विश्वास था कि हिन्दू और मुसलमान साथ रह सकते हैं और उन्हें साथ रहना चाहिये। उन्होंने विभाजन का घोर विरोध किया: मेरी पूरी आत्मा इस विचार के विरुद्ध विद्रोह करती है कि हिन्दू और मुसलमान दो विरोधी मत और संस्कृतियाँ हैं। ऐसे सिद्धांत का अनुमोदन करना मेरे लिए ईश्वर को नकारने के समान है।

बहुत सालों तक गांधी और उनके अनुयायियों ने कोशिश की कि मुसलमान कांग्रेस को छोड़ कर न जाएं और इस प्रक्रिया में हिन्दू और मुसलमान गरम दलों के नेता उनसे बहुत चिढ़ गए।

अंग्रेजों ने योजनाबद्ध रूप से हिन्दू और मुसलमान दोनों संप्रदायों के प्रति शक को बढ़ावा दिया। मुस्लिम लीग ने अगस्त 1946 में सिधी कार्यवाही दिवस मनाया और कलकत्ता में भीषण दंगे किये जिसमें करीब 5000 लोग मारे गये और बहुत से घायल हुए। ऐसे माहौल में सभी नेताओं पर दबाव पड़ने लगा कि वे विभाजन को स्वीकार करें ताकि देश पूरी तरह युद्ध की स्थिति में न आ जाए।

कोरोना वायरस ने भारत में भी अपने पैर पसार लिए हैं। जिसे लेकर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विभिन्न प्रयास कर रहे हैं। बहुत हद तक उन्होंने कोरोना के संक्रमण से लोगों को बचाया भी। नहीं तो स्थिति आज कुछ और होती। शायद सड़कों पर कोरोना से संक्रमित लोगों की लाशें बिछीं होतीं और उन्हें छूने वाला कोई नहीं होता। आज इंसान घरों में कैद है और पक्षी स्वतंत्र। इसके जिम्मेदार भी मनुष्य ही हैं, फिर चाहे वे किसी भी देश के हों।

खैर, देश के विभिन्न राज्यों में इस कोरोना वायरस से लड़ने के लिए मुहिम चलाई जा रही है। अभी कुछ पहले प्रधानमंत्री ने देश में #ताली_और_थाली_बजाने के लिए बोला था। ताली और थाली तो बाद में बजीं किंतु कुछ लोगों के गाल पहले ही बजने लगे। ऐसे लोगों को हमारे देश में प्रायः #शांतिदूत(जाहिल प्रवृत्ति के) कहते हैं।

इन दिनों लोगों में कोरोना को लेकर डर का माहौल बना हुआ है। इसी डर को कम करने के लिए ताली और थाली बजाने की बात प्रधानमंत्री ने की थी। दरअसल रोग हो या शत्रु उससे जीत हासिल करने के लिए सबसे पहले हमारे इरादों को मजबूत होना जरूरी है। हमें इस समय कमजोर नहीं पड़ना है, सबको एकजुट होकर इस गंभीर हालात से लड़ना है। लेकिन इसके पीछ महज इतनी बात नहीं है। इतिहास के पन्नों में जाकर देखेंगे तो आपको यह भी पता लगेगा कि इसी तरह की एक पहल से भगवान राम के पूर्वज महाराजा रघु ने कमाल कर दिखाया था और अपने जमाने से गंभीर रोग का अंत कर दिखाया था।

महाराजा रघु के समय में एक राक्षसी ढुंढी कहीं से आ गई। यह राक्षसी बच्चों की हत्या कर देती थी। इससे पूरे राज्य में हाहाकर मचा था। इसे वरदान प्राप्त था कि इसे ना देवता मार सकते थे ना मनुष्य, इसे अस्त्र, शस्त्र से भी नहीं मारा जा सकता था। ऐसे में चिंतित रघु को राज पुरोहित ने सलाह दी कि इस राक्षसी का अंत बच्चे ही अपनी किलकारी से कर सकते हैं। महाराज रघु के कहने पर राज्य के सभी बच्चों ने हाथों में जलती लकड़ी लेकर खूब हो-हल्ला मचाना शुरू कर दिया। कुछ बच्चे ताली बजा रहे थे, कुछ खूब-हंसी ठिठोली कर रहे थे। बच्चों के शोर को सुनकर ढुंढी आई और बच्चों ने उसका अंत कर दिया। यहां राक्षसी ढुंढी प्रतीकात्मक भी हो सकती है जो एक महामारी रही हो जो बच्चों की जान ले रही थी। इससे बच्चों के आनंद-उत्साह ने हरा दिया।

थाली-बाटी बजाने की जहां तक बात है तो हमारे देश में सदियों से परंपरा चली आ रही हैं कि बच्चों के जन्म के बाद घर की महिलाएं हाथी बजाती हैं। यह उत्साह का प्रतीक होता है। माना जाता है कि इससे घर से नकारात्मकता दूर जाती है और सकारात्मक ऊर्जा की वृद्धि होती है।

देश के कई भागों में ऐसी मान्यता है कि दीपावली की रात में आधी रात बीत जाने पर ब्रह्म मुहूर्त में घर की महिला सूप-डगरा लेकर उसे एक सरकंडे से बजाती है। उस समय महिलाएं बोलती हैं अन्न,धन-लक्ष्मी घर आए। कलह, दरिद्रता बाहर जाए। यह भी सकारात्मकता को बढ़ाने का एक तरीका है जो हमारे देश की परंपराओं में शामिल है।

इन धार्मिक पहलुओं के बाद अगर इसके वैज्ञानिक पक्ष पर गौर करें तो एक खास तरह की ध्वनि से चिकित्सा भी किया जाता है जिसे ध्वनि चिकित्सा कहते हैं। वैज्ञानिक भी मानते हैं कि ध्वनि के विशेष कंपन से मन और मस्तिष्क प्रभावित होता है जो शरीर की कोशिकाओं को एक्टिवेट करता है और रोगों से बचाता है। ओम के उच्चारण का लाभ तो वैज्ञानिक भी स्वीकार करते हैं। शंख की ध्वनि के बारे में कहा जाता है कि इसके नाद से जो कंपन उत्पन्न होता है वह धरती के अंदर सोए सूक्ष्म जीवों को भी प्रभावित करता है और जहां तक इसकी ध्वनि गूंजती है वहां तक नकारात्मक ऊर्जा में कमी आती है। हमारे देश में मंदिरों में और विशेष पूजा अवसरों पर घंटी-घड़ियाल बजाने के पीछे भी यह वैज्ञानिक कारण है कि इससे सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

दूसरी ओर अब पीएम ने 05 अप्रैल यानी कल दिए और दीपक जलाने की बात कही। इस पर भी कई लोगों ने खिल्लियां उड़ाईं। ऐसे लोगों को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है क्योंकि ये #शांतिदूत हैं, जिन्हें अपनी बहन और खाला में भी फर्क नहीं समझ आता। इन्हें सबमें अपनी बीबी नजर आती है और नजर आए भी क्यों न, इन्हें तो बस अपनी हवस पूरी करनी होती है।

#भूख, नींद और हवस, ये तीनों चीजें इंसान और जानवर में कॉमन होती हैं।
इंसान को जानवर से अलग बनाने वाले गुण भावनाएं, विवेक, बुद्धि, हित-अहित की समझ और समाज की परख आदि हैं। जो इन शांतिदूतों को कभी मिले ही नहीं। वैसे तो मैं इन शांतिदूतों का इतिहास भी भलीभांति जनता हूँ लेकिन फिर पोस्ट ज्यादा लंबी हो जाएगी इसलिए अभी नहीं लिखूंगा।

खैर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को देश को संबोधित किया और कोरोना वायरस से लड़ाई में जनता के धैर्य व बरते जा रहे अनुशासन की सराहना करते हुए धन्‍यवाद भी कहा। इसके बाद उन्‍होंने 5 अप्रैल को रात 9 बजे मोबाइल फ्लैशलाइट, मोमबत्‍ती, टॉर्च और दीये जलाने को कहा है।

निगेटिव चीजों को नष्‍ट करने में प्रकाश की अहम भूमिका....

पूजा के समय दीपक जलाने का बड़ा महत्‍व है वहीं कई धर्म में मोमबत्‍तियां जलाई जाती हैं। वैज्ञानिक नजरिए से प्रकाश का अपना अलग महत्‍व है। रोशनी में गर्मी तो होती ही है साथ ही यह निगेटिव चीजों को नष्‍ट भी करता है जैसे बैक्‍टीरिया, वायरस आदि।

जिन्हें इस चीज पर भरोसा नहीं है, वे सीधे तौर पर यह समझ लें कि एक वह घर है जहां रोजाना रोशनी होती है, पूजा आदि होती है। वहां खुशहाली रहती है और सकारात्मक वातावरण बना रहता है और दूसरी ओर सालों से वीरान पड़ी कोई हवेली। जहां वर्षों से प्रकाश न गया हो, वहां नकारात्मकता का वास होता है। इन दोनों चीजों में फर्क आपको समझ आ गया होगा। लेकिन शांतिदूतों को यह भी समझ नहीं आएगा। क्योंकि इनकी संस्कृति अब अलग हो चुकी है और जिसकी संस्कृति और संस्कार ही अलग है, उसे ये बातें समझ नहीं आएंगी। इनका हाल उस सुअर की तरह है, जिसे आप कितना नहलाओ, साफ करो। मौका देखकर वह नाली में घुसेगा और गुह खायेगा। उसे वही अच्छा लगता है।

अब बात करते हैं पुलिस प्रशासन की, आज कोरोना वायरस से लड़ने के समय में पूरे देश का पुलिस प्रशासन और डॉक्टर्स हमारी हर तरह से मदद कर रहे हैं। क्या अपने कभी सोंचा है कि पुलिस भी कभी किसी को घर में खाना देने जाती हो, दवाई देने जाती हो। लेकिन आज ऐसा हो रहा है। क्योंकि पुलिस हमारी रक्षा के लिए हमें घर से बाहर निकलने नहीं दे रही है और घर पर ही सारी चीजें उपलब्ध करा रही है। जरा सोचिए कि यदि पुलिस न होती तो देश का क्या हाल होता आज। हमारे जिले के डीएम, एसपी सहित अन्य अधिकारी सहित पूरा प्रशासन दिन रात इसी चीज में लगा है कि कैसे भी करके लोगों को इस बीमारी से बचाकर रखें। नहीं तो उन्हें क्या जरूरत है, उनके भी बच्चे हैं, उनका भी परिवार है। लेकिन वे हमारे लिए सब कर रहे हैं। दूसरी ओर ये शांतिदूत कहीं इंदौर में पत्थरबाजी करते हैं और कहीं दिल्ली में जवानों पर थूकते हैं तो कहीं गाज़ियाबाद के अस्पताल में नंगे घूमते हैं। क्या चाहते क्या हो कि पीएम सीधे शूट करने का आर्डर दे दें तब मानोगे क्या।
जाहिलियत से परिपूर्ण इन शांतिदूतों को बस देश में आग लगानी है बस।

अरे हम दीपक जलाने वाले लोग हैं, तुम्हारी तरह देश को जलाने वाले लोग नहीं। साले, जिस देश में रहते हैं, उसी को गंदा करते हैं। अगर तुम इतने ही सही होते तो फिर तुम्हारे समाज पर लोग इतनी थू थू नहीं करते। फिर कहते हो कि भेदभाव किया जा रहा है, भाईचारा नहीं निभाया जा रहा। अबे कह तक निभाये भाईचारा। तुम करो तो शांतिदूत और हम करें तो कट्टरवादी। हद्द है अब तो।

नोट- जिन शांतिदूतों को लगता है कि थाली बजाना और दीपक जलाना बेबुनियाद है। वो जरा बताएं कि फिर कोरोना वायरस से बचने का तरीका क्या है। अगर हो कोई तरीका तो बताओ। नहीं तो चुप एक दम।

हम थालियां पीटते हैं, डॉक्टर्स को नहीं, हम दिये जलाते हैं, देश नहीं।

हर शांतिदूत अब्दुल कलाम नहीं होता।